भागलपुर, राजनीति, धनबल और चुनाव...
भागलपुर यूं तो सिल्क सिटी माना जाता है परंतु भागलपुर को चुनावी समीकरण का भी शहर कह सकते हैं। यहां कभी कांग्रेस जीता करती थी तो कभी भाजपा तो कभी राजद तो कभी कम्युनिस्ट तो कभी फलां तो कभी ढिमका।
लेकिन भागलपुर ने राजनीति को सदा ही अलग दिशा और दशा प्रदान की।
जब 2014 में प्रबल मोदी लहर थी तब भागलपुर ने भाजपा के दिग्गज नेता का पत्ता ऐसा साफ किया कि काफी प्रयास और प्रतीक्षा के बाद उन्हें राष्ट्रीय राजनीति से राज्य की राजनीति में आना पड़ गया।
खैर, राजनीति तो यूं ही चलती रहेगी। लोकसभा हो या विधानसभा या फिर विधान परिषद का चुनाव हो। भागलपुर में रंग रंग के नेता हैं और रंग रंग के वोटर हैं। कोई एक ग्लास दारू में बिक जाता है तो कोई एक बोतल दारू में तो कोई कुछ रुपये में बिकता है तो कोई ज़्यादा लेकर बिकता है।
विगत कई वर्षों से वोटर की खरीद फरोख्त का सिलसिला जारी है। लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था। पहले और अब में काफी अंतर आ गया। अब चुनाव का मतलब है कि नेता लोग आएंगे तो पैसा बहाएंगे और कुछ न कुछ जेब में भी देकर जाएंगे।
पूर्व सांसद सह पूर्व विधायक सुबोध राय जब कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट से विधायक बने तब आखिरी बार भागलपुर ने ईमानदार चुनाव देखा होगा। उसके बाद #सुशासनबाबूकेहाफपैंटवालेदोस्त पहली दफा चुनाव लड़े फूल वाली पार्टी के टिकट से और पैसा बांटने की आधारशिला यहां से रखी जानी शुरू हुई।
जब पैसे बांटने की आधारशिला रखी गई तो ठीक इसके बाद फिर एक #घोषणाबाज़ नेता का उदय शहर में हुआ। काफी दूर के नेता रहे थे, वो अब भागलपुर को अपना मानने लगते हैं लेकिन उन्होंने चुनाव जीतने के लिए काफी धन बहाया और जीत भी गए। दो बार सांसद बने।
फिर बारी आई राजधानी वाले बाबू साहब की जो कभी राजद, तो कभी जदयू तो कभी जन अधिकार पार्टी में घूमे और लोग भी उनके इर्दगिर्द घूमने लगे। फिर उन्होंने अपने पहले चुनाव में नोटों की बोरियां बांटने के सिलसिले का आगाज़ किया जो अब तक बदस्तूर जारी है।
हकीकत तो ये है कि आज के दौर में हर चुनाव पैसा आधारित हो चुका है। अब मुखिया चुनाव हो या फिर मेयर चुनाव या कोई भी अदना सा चुनाव। अब नोट के बिना वोटर वोट नहीं करता।
आखिर हो क्या गया हमारी राजनीतिक सोच को? क्या हम इतना नहीं समझ पाते कि जो नोट देगा वो काम क्या खाक करेगा? हमारा विकास करने से पहले अपने विकास करेगा।
समझना होगा वरना मिट जाएंगे और दास्तान तक न नसीब होगी दास्तानों में।
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